October 23, 2020
  • October 23, 2020

Ashtang Yog Ki Sanhi Jankari

By on March 29, 2019 0

Ashtang Yog Ki Sanhi Jankari

 

Yog Kya ha :-

Yog शब्द “यूज “धातु से बना है । जिसका अर्थ होता है जोड़ना । जीव आत्मा का परमात्मा से मिल जाना ,एक हो जाना ही Yog है। योगाचार्य महर्षि पतंजलि ने संपूर्ण योग के रहस्य को अपने Yog दर्शन में सूत्रों के रूप में उपदेश किया है।

Ashtang Yog Ki Sanhi Jankari

Yog के द्वारा विभिन्न दशाओं को पार करता हुआ व्यक्ति मन और आत्मा शक्ति का विकास करता हुआ आत्म ज्ञान को प्राप्त होता है । हमारे ऋषि-मुनियों ने योग के माध्यम से मन और प्राण ,शरीर, की शुद्धि तथा परमात्मा की प्राप्ति के लिए आठ प्रकार के साधन बताए हैं जिसे अष्टांग Yog कहते हैं

1.यम:-

अ. अहिंसा :-

अहिंसा का अर्थ है हिंसा ना होना मन वचन कर्म से किसी प्राणी को ना सताना अहिंसा है।

ब. सत्य :-

सत्य का अर्थ है – झूठ ना बोलना ! जिस वार्तालाप और व्यवहार से सबका हित हो वह सत्य है।

स. अस्तेय :-

चोरी ना करना – पराई वस्तु को उसके स्वामी से पूछे बिना ना लेना अस्तेय है

द. ब्रह्मचर्य :-

ब्रह्मचर्य का मूल अर्थ है – इंद्रिय संयम ! शरीर की शक्ति रक्षण ब्रह्मचर्य है।

ई. अपरिग्रह :-

अपरिग्रह का एक और नाम है असंग्रह अर्थात संग्रह ना करना ।अनावश्यक वस्तुयें , द्रव्य आदि को एकत्र ना करना अपरिग्रह है ।

Ashtang Yog Ki Sanhi Jankari

2.नियम

अ. शौच :-

शौच का अर्थ है पवित्र ।शरीर और मन दोनों की पवित्रता से वास्तविक अर्थ पूरा होता है ।

ब. तप :-

भूख, प्यास, शीत उष्ण, स्थान तथा आसन के कष्टों को सहन करना। तप का तात्पर्य कष्ट ‘सहन’ है।

स. स्वाध्याय :-

आत्म ज्ञान की प्राप्ति के लिये नित्य नियम से पठन -पाठन स्वाध्याय कहा जाता है।

द. संतोष :-

संतोष का अर्थ प्रसन्नता ,खुशी ,आनंद है , जैसे भी भली बुरी परिस्थिति सामने हो उसमें प्रसन्न रहना संतोष है। अथवा शरीर से पूर्ण पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त धन से अधिक की लालसा न करना न्यूनाधिक की प्राप्ति पर शोक और हर्ष ना करना।

वस्तु दोष निवारण पढ़ें https://mantragyan.com/vashtu-tips/vashtu-dosh-nivaran-kase-kare/

ई. ईश्वर प्राणिधान :-

प्राणी धान माने :-धारण करना, स्थापित करना, ईश्वर प्राणी धान अर्थात ईश्वर को धारण करना, ईश्वर को स्थापित करना, अथवा जितने भी कर्म बुद्धि ,वाणी और शरीर से किए जाते हैं ,और छोटी से छोटी क्रिया मात्र को परम गुरु भगवान अथवा ईश्वर को अर्पण करते ज्ञान जाना तथा उन कर्मों के फलों को भी भगवान को अर्पण कर देना, ईश्वर प्राणिधान है।

3.आसन:-

आसन शरीर की वही स्थिति है जिसमें आप अपने शरीर और मन के साथ शांत स्थिर एवं सुख से रह सके।

4.प्राणायाम:-

प्राणायाम अर्थात आसन की स्थिरता होने पर स्वास स्वास की स्वभाविक गति का नियमन करना,प्रणायाम है।

5.प्रत्याहार:-

अपने-अपने विषयों के
संग से रहित होने पर इंद्रियों का चित के रूप में अवस्थित हो जाना प्रत्याहार है।

6.धारणा:-

चित्र को किसी एक विषय में स्तर करने का नाम धारणा है।

7.ध्यान:-

ध्यान क्या है ? ध्यान वह है जो आपको गहरा विश्राम देता है, बाकी ध्यान में गहराई से गहरा होना कहा जाता है। ध्यान के लाभ कई गुना हैं।

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लाभ :-

एक शांत मन, अच्छी एकाग्रता, धारणा की स्पष्टता, संचार में सुधार, आंतरिक शक्ति, और विश्राम नियमित रूप से ध्यान करने के सभी प्राकृतिक परिणाम हैं। यह एक आवश्यकता है। ध्यान में बिना शर्त खुशी और मन की शांति के लिए ध्यान करा जाता है।

8.समाधि:-

समाधि में केवल ध्येय मात्र की प्रतीति होती है , चित का अपना स्वरूप शून्य हो जाता है, वही ध्यान की गहराई समाधि कहलाती है। समाधि का व्यवहारिक अर्थ हमारा मन मनोविकार में सम रहे

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Focus Word :-

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