October 22, 2020
  • October 22, 2020

Pyar Kya hai Bhakti Kya

By on January 26, 2019 1

Pyar Kya ha Bhakti Kya

Pyar Kya ha Bhakti Kya ईस लेख में हम समझेंगे, आज के दौर में जैसे चलन में है की मै फलाना -फलाना वस्तु कमा कर सूखी होऊंगा यह अहंकार का भोग का रास्ता है ,Pyar Kya ha Bhakti Kya ? प्यार में संजोया नहीं जाता यानी खोया जाता है ।

जब आप प्रत्याहार सीद्ध कर लोगे तो Pyar Kya ha Bhakti Kya यानि हर किसी को सुख देने का भाव अपने अहंकार को खोने का भाव लाओगे तब Pyar Kya ha Bhakti Kya संही मायने में समझोगे प्यार सदा देना जानता है लेना नहीं । अगर आप लेना चाहते हो तो यह तो सौदा है, भक्ति नहीं है प्यार नहीं है जब तक आप खोना नहीं सीखे तो Pyar Kya ha Bhakti Kya है समझा नहीं।

Pyar Kya ha Bhakti Kya

जो जगत से सुखी होना चाहता है,भौतीक वस्तु से या पत्नी ,रंग या धन से वह अकड़ने का मजा लेगा – ‘मेरे पास इतनी गाड़ियाँ हैं, इतनी मोटरे हैं, इतना अधिकार है, और अधिकार हथियाऊँ….’ यह रावण का रास्ता है और गुरु के प्रसाद से जो तृप्त हुए हैं, गुरू सेवा से त्रीप्त रहता है, उनका राम जी का रास्ता है।

Pyar Kya ha Bhakti Kya

सब कुछ देकर नंगे पैर जंगलों में घूमते हैं फिर भी राम जी संतुष्ट हैं, प्रसन्न हैं और रावण के पास सब गुछ है फिर भी असंतुष्ट है, अप्रसन्न है। अपनी पत्नी और लंका की सुंदरियाँ मिलने पर भी अहंकार चाहता है कि इतनी सुंदर सीता को लंका की शोभा बढ़ाने को ले आऊँ। अहंकार ले-ले के, बड़ा बनकर सुखी होना चाहता है और प्रेम दे देकर अपने आप में पूर्णता का एहसास करता है !

अहंकार क्रोध में, वस्तु जन्य सुख में, लोभ में, विकारों में बरसकर, दूसरों को परिताप पहुँचाकर सुखी होना चाहता है लेकिन प्रेम अपनी मधुमय शीतलता से बरसते हुए दूसरों के दुःख, रोग, शोक हरकर उनकी शीतलता में अपनी शीतलता का एहसास करता है। अहंकार की छाया ऐसी है कि अहंकार छायामात्र शरीर को ‘मैं’ मानेगा और अपने आत्मा को ‘मैं’ रूप में न सुनेगा, न मानेगा, न जानेगा। जबकि प्रेम शरीर को क्षणभंगुर जानता है व मन परिवर्तनशील, तन परिवर्तनशील, चित्त परिवर्तनशील… उन सबका साक्षी हो जो है अपरिवर्तनशील, उस अपने आत्मदेव को ‘मैं’ मानता है, जानता है।

भक्ति मति मीरा

भक्ति मति मीरा

Bhakti Kya ha ?

जो सबका साक्षी है, उसमें तृप्त होने का यत्न करता है तो जिज्ञासु है। आत्मा में ही आनंद मनाता है सच्चे अर्थ में भक्त है। तृप्त हो गया तो व्यास जी है, कृष्ण जी है, राम जी है, नारायणस्वरूप है। अहंकार तोड़ता है और महापुरुष जोड़ते हैं। अहंकार अपनी छाया से हमें विक्षिप्त और वासनावान करता है लेकिन प्रेम अपनी प्रभा से हमे विकसित, संतुष्ट, तृप्त, दानी और निरभिमानी करता है। अहंकार संग्रह से संतुष्ट होता है और प्रेम बाँटकर तृप्त होता है।

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Pyar Kya ha ?

सबरी ने कभी कुछ नहीं चाहा अपने गुरू आज्ञा में संतुष्ट रही, चाहे उनका सेवा झाडू का ही क्यों न हो, गुरू की हरेक आज्ञा से प्रेम था Pyar Kya ha Bhakti Kya अहंकार बाह्य शक्ति, सामग्री से बड़ा होना चाहता है और प्रेम परमात्म-प्रीति से पूरे बड़प्पन में अपने को ‘मैं’ मिलाने में राज़ी रहता है। तरंग कितनी भी बड़ी बने फिर भी सागर नहीं हो सकती है लेकिन छोटी-सी तरंग अपने को पानी माने तो सागर तो वह खुद ही है।

बडी समस्या

लोग पढ कर भी अपढ है यानि यह जीव शरीर को ‘मैं’ मानकर, कुछ पा के जो बड़ा बनता है, ये उसके बड़प्पन के ख्वाब रावण की दिशा के हैं। एम.बी.ए. पढ़े हुए बच्चों को सिखाया जाता है कि गंजे आदमी को कंघी बेचनी है और नंगे लोगों को कपड़े धोने का साबुन बेचना है। चाहे उनको काम आये या न आये, उनसे पैसे बनाओ। साधन इकट्ठे करो और सुखी रहो। जो भी ऐसा रास्ता लेते हैं वे खुद परेशान रहते है और दूसरों का शोषण करते हैं लेकिन जो शबरी का, मीरा का, रैदास जी का, राजा जनक का रास्ता लेते हैं वे खुद भी तृप्त होते हैं, दूसरों को भी तृप्त करते हैं।

स तृप्तो भवति। सः अमृतो भवति।

स तरति लोकांस्तारयति।

अहंकार लेने के अवसर खोजता है और प्रेम देने के अवसर खोजता है। चाहे निगाहों से पोसे, वाणी से पोसे, भजन से ज्ञान दे , डांट कर भला करे अथवा हरि ॐ करके, प्रणाम करके पोसे, नम्रता के गुण देकर उनकी उन्नति करे… प्रेम अवसर खोजता रहता है कि मेरे सम्पर्क में आने वाले पोषित हों और जो सम्पर्क में नहीं हों वे भी पोषितों से पोषित हों। जो अहंकारी सबसे आगे और विशेष होने में मानता है और जो प्रेमी गुरू भक्त सबके पीछे रहकर, सेवा खोज के, मिटकर अमिट को पाने में सफल हो जाता है। राजा चतुरसिंह के उदयपुर राज्य में सत्संग होता था। वे संत महात्मा के चरणों में जाते, पीछे बैठ जाते।

Pyar Kya ha Bhakti Kya

Pyar Kya ha Bhakti Kya

प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाहिं।

अहंकार और प्रेम…. एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहतीं। अहंकार सब कुछ पा के, कुछ बनकर सुखी होने की भ्रांति में टकराते-टकराते हार जाता है, थक जाता है और प्रेम सब कुछ देते-देते अपने पूर्ण स्वभाव को जागृत कर लेता है।

Pyar Kya ha Bhakti Kya जिसने जान लिया उन्हें उनको जन्म लेने की जरूरत नहीं ईसी जन्म में गुरु सेवा खोज कर गुरू ज्ञान को अपना ज्ञान बना लेता है।

जो संसार में सुखी होना चाहता है, वह बड़े दुःख को बुलाता है। संसार दुःखालय है उसमे वासना को ही पोषित करता है Pyar Kya ha Bhakti Kya समझ ही नहीं सकता। संसार की सुविधा पाकर जो सुखी रहना चाहता है, वह किसी न किसी से धोखा, शोषण और कई वस्तुओं की पराधीनता करेगा और जो संसार में गुरू ज्ञान को आगे बढाने में सेवा खोजकर निर्वासनिक होता है, उसका प्रेम स्वभाव स्वतः जागृत होता है। वरना सारा जमाना Pyar Kya ha Bhakti Kya किताबी बात मानता है ।

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