October 30, 2020
  • October 30, 2020

Kundlini Sakti Kya ha, Jagane Ki vidhi.

By on December 12, 2018 0

Kundlini Sakti Kya ha, Jagane Ki vidhi.

kundlini sakti क्या है ,jagane की विधियां :-

सभी जीव मात्र में एक ऐसी रहस्य मय शक्ति सुप्त अवस्था में विद्यमान है जिसे सिर्फ और सिर्फ मनुस्य ही जगा सकता हे इस महा शक्ति को योग शास्त्र में काफी विस्तार से वर्णन किया गया है।

इस महा शक्ति को ही kundlini कहा जाता है, मनुष्य के भीतर मूलाधार केंद्र में निवास करने वाली kundlini sakti अगर जाग्रत हो जाये तो जो साधक है जिसने ईसे जगाने का उद्यम किया है । उनके अंदर दिव्या गुण विधमान होते हैं वह जाग्रत हो जाता है !

जीससे :- क्षमा,दया अहंकार से मुक्त और उनके शरीर में तेज ओज रूपांतरित होने लगता हे। जो सप्त धातु अब तक काम और क्रोध में बह रहा था वो साधक में तेज और ओज में रूपांतरित होने लगता है और वो मनुष्य साधारण नहीं रहता । साधारण से असाधारण प्रतिभा सम्पन व्यक्ति बनने लगता है ।

साधकों! कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार से ऊपर उठाकर सहस्त्रसार अर्थात मस्तिक तक पहुँच जाति है मस्तिक में ब्रम्हरंध्र ही प्रमुख स्थान हे।

सहस्त्रसार के जागरण के बाद मनुष्य में गुप्त शक्तिया जाग्रत हो जाती हे। और उनमे अनेको सीद्धीयां जाग्रत हो जाती हे। वो सम्पूर्ण भ्रमांड के रहस्यो को जानने लगता है, उसका जीवन तूच्छ नहीं रहता, निम्न नहीं रहता उसका संपूर्ण जीवन ऊर्जा से भर जाता हे।

महापुरुष कहलाने के योग्य बन जाता है क्योंकि उनमे दिव्य गुण सामने झलकने लग जाता है । जैसे छोटी छोटी बात में न चिढ़ाना। काम से मुक्त होना क्रोध उस पर हावी नहीं कर सकता और भी काफी सरे गुन समां ,दया ,सौहार्द्र जो भी दिव्य गुन सुसुप्त था वो जाग्रत हो जाता है 7 चक्र में उनके माथे के बिच जो आज्ञा चक्र हे, जिन पर क्रिया योग के बाद ध्यान लगाने से ऊर्जा का प्रवाह जागृत हो जाता हे ।

साधकों :- कुंडली शक्ति को जाग्रत करने एक आसान तरीका हे ” क्रिया योग “

कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है गुरु के मंत्र को श्रद्धा पूर्वक जप करने से या निष्काम कर्म करने से ,सेवा करने से और मूलाधार से कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होने की प्रक्रिया शुरु होती है जिससे काम क्रोध मन की चंचलता बढ़ने जैसी भासने लगती है। जब भी क्रिया योग करेंगे या इस मार्ग में आएंगे हमें सुरुवात में ऐसा भासेगा की पेहले जो हमरा वासना सुप्त था और भी तेज हो गया है।

मतलब हमें क्रोध बढ़ता सा भासता है हममे चिड़ चिड़ापन आ जाता है और मूलाधार के जागरण के लिए शाम्भवी मुद्रा का अभ्यास सर्वश्रेठ माना गया है।

कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार में एक सर्पानि के भीतर छिपी हुई है। जैसे – जैसे ध्यान प्रगाढ़ होता जायेगा। ब्रमांड का ज्ञान अपने इन्दर महसूस होने लगेगा, और ध्यान लगाने पर हलके रंग की प्रकाश से सुरु होकर अलग अलग दिव्य अनुभव कराता हुआ ध्यान की अवस्था मे गहरा उतारते उतारते आज्ञा चक्र में सम्पूर्ण भ्रमांड का रहस्य हमें भासने लगता है। और तब व्यक्ति साधारण नहीं रहता दिव्या शक्ति गुप्त रहस्यों को जानकर एक महापुरुष और ज्ञानी बन जाता है।

और ऐसा योगी लोक लोकांतर के रहस्यो को जानने में समर्थ हो पता है ऐसा योगी दिव्य रहस्यो का जानकर होता है , और ऐसा योगी लोक लोकांतर का रहस्यों का भी जानने लग जाता है सृष्टि की उत्पति से लेकर विनाश तक के रहस्यो को जान लेता है, ऐसा योगी शुषुम्ना नाड़ी को जागरण कर दिव्य आनंद से सदा आनंदित रहता है, और जन्म मरण से मुक्त हो जाता है, शास्त्रों ने जिसे जीव को शिव से मिलान कहा गया है । कुंडली प्राकृतिक स्वरुप है। और जीव प्रमात्मा को प्राप्त कर लेता है । जीव शिव को प्राप्त कर लेता है।

और ईसे ही साक्षात्कार कहा गया है। यानी सदा आनंद स्वरुप को प्राप्त कर लेना ही योग का लक्ष्य है।

शास्त्रो मे काफी वर्णन है और जिव का परम सिद्ध अधिकार है कुंडली जागरण का याने हर जिव को ईसे प्राप्त करने का अधिकार बताया गया है जिसका जागरण क्रिया योग , ज्ञान योग ,गुरु के बताये हुए मंत्र के जाप, श्रद्धा पूर्वक निष्काम कर्म योग , से संभव है ।

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