October 30, 2020
  • October 30, 2020

sadhna Me Success Method and guru ka mahatv

By on March 9, 2019 0

sadhna Me Success Method and guru ka mahatv

इस artical में sadhna में सबसे आसान sadhna and guru puja vidhi के बारे में चर्चा करेंगे। mantra को साधना करे या कोई भी साधना करे ,चाहे आप आर्थिक, भौतिक और अध्यात्मिक विकास करना चाहते हो हमारे साथ जुड़े रहे and artikal sadhna Me Success Method and guru ka mahatv, में बताये नियम का पालन करे and लाभ उठाये।

guru का महत्ता :-

आज हम चर्चा करने वाले हैं एक ऐसे विषय जिसे हर किसी को जाना चाहिए, jast like जैसे कि क्या ज्ञान अपने आप ज्ञान पा सकते है ?या ज्ञान के लिए guru jaruri है? guru dikcha क्या है ? guru का अधिक mahatv क्यों है ? that कि हर शास्त्र, हर संत कहता है, that कि guru dikcha लेनी चाहिए। कुछ लोग मानते है , कि लाल रेशम बांध ले and धन से मालामाल हो जाए, कर्म करने की जरूरत ही नहीं, and You tub में ऐसा वीडियो भी दिखाया जाता है, की thard eye ओपन करने का 70,000 मांग रहा था ,जैसे की लोगो नें बताया ।

ईश्वर की खोज ईसे भी पढें https://mantragyan.com/satshang-gyan/ishwar-ko-kaise-khoje-swami-vivekanand-life/

sadhna Me Success Method and guru ka mahatv :-

अगर किसी का thard eye खुला है तो उन्हें पैसे का क्या जरूरत आन पड़ी ? मैं कहना चाहूंगा ऐसा अंधकार युग उस समय भी आया था, जब ऋषि आपस में लड़ रहे थे ,एक दूसरे में लड़ रहे थे, मैंने शास्त्रों में पड़ा कि उस समय वशिष्ठ जी के सौ पुत्रों को एक ऋषि ने मार डाला यानी अंधकार का सीमा था !उस युग में , उस समय जब ऐसा अंधकार चारों तरफ फैल गया, शत्रुता को समाप्त करने के लिये !

सारे ऋषि आपसी सहमति से सभा आयोजन किया , and उन सभी में 100 साल, 200 साल ,300 साल , उम्र वाले भी ऋषि सामील हुये। और 88000 ऋषि के बीच में किसको अध्यक्क्ष बनाया जाय।

Method and guru ka mahatv :-

And उस समय सुखदेव जी का उम्र केवल 12 साल था । उनको व्यासपीठ पर बीठाया गया। जबकि उसी ऋषियों में शामिल पिता, दादा, चाचा, और बाकी सब 88000 ऋषि नीचे आसन में बैठे ।

और निर्णय यही हुआ कि आदमी की ऊंचाई उम्र, या शरीर के रंग, रुपये की कमाई से नहीं हो सकती । and आदमी की महानता धन से होती तो धनाढय कई थे, कई लोग थे जिनके घर में लक्ष्मी नृत्य करती थी । और उनमें अध्यक्ष बनता मगर नहीं बन पाया ।

पुर्ण कौन ,ज्ञान का अधिकारी कौन :-

जिसके पास ज्ञान है वहीं पर्ण है ! उन जीन साधको यानि जिनके पास श्रद्धा है ,और समर्पण है अधिकारी है ।

गुरू

And आज हम चर्चा करेंगे कि गुरु कौन है ? हमने जाना कि जिनके पास ज्ञान वही गुरू है ।

And अगर ज्ञान को महत्व नहीं दी जाती तो 12 साल का Shukh dev ji कैसे उच्च आसन पर बैठ पाता , तो प्यारे ज्ञान ही श्रेष्ठ है !

सुखदेव जी ने जो 12 साल की उम्र के थे ,उसे ऋषियों ने पूछा कि हम कैसे साधना करें ? कैसे हम परमात्मा को प्राप्त करें ?

then तब सुखदेव ने कहा ! उत्तम भाव , Sradha ,Vishwash के माध्यम से ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है और and सबसे कठिन सेवा है , क्योंकि उसमें आज्ञा पालन ही है , लेना कुछ नहीं है ,सिर्फ देना ही देना है , आज्ञा पालन की करना है ,और उसके माध्यम से ही सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं !

यानी प्यारे अगर आप guru करते हैं तो आपको guru का होकर रहना , guru बनाना नहीं है guru का बनना है ! लोग कहते हैं कि मैंने guru बनाया guru को आप क्या बनाएंगे !

ज्ञान को आप क्या पाएंगे , आपने तो गुरू बनाया था but आपको guru का ज्ञान का बनना होगा ।

प्यारे!

ऋषियों ने सुखदेव जी से कहा हम जल्दी से जल्दी अपने ब्रह्म भाव को ,भक्ति प्राप्त करना चाहते हैं । and निश्चित प्राप्त करना चाहते हैं , and क्या करें ?

तो सुखदेव जी जो 12 साल के थे उन्होंने कहा कि Only गुरु चरणों की सेवा के माध्यम से ,आपके हृदय में गुरु किसी न किसी रूप में स्थापित हो , because क्योंकि मैं ही आपके व्यक्तित्व को पा सकते हैं ।

तुम गुरु के चरणों की सेवा से , उनके वंदन से ही ब्रम्ह तत्व को पा सकते हो। प्यारें ! साधक ज्ञान को क्यों प्राप्त नहीं कर पाता है ? या कोई भी व्यक्ति अगर मेहनत करें और सफलता क्यों प्राप्त नहीं होता ?उसके पास ज्ञान क्यों नहीं आता ?

Because क्योंकि वह समर्पण नहीं करता , गुरु का होकर नहीं रहता , प्यारे! अपाहिज , अपंगता या भौतिक जो भी दिक्कतें ,उनके जीवन में आई हैं ।जैसे :- आर्थिक दिक्कतें ,

उस साधक नें अपने अहं का समर्पण नहीं करा ,कर्म की प्रति, गुरु के प्रति , इसीलिए उनके साथ ही सारी दिक्कतें हैं ।

अगर वह guru पर समर्पित हो जाए तो guru ही माता है guru ही पिता है guru ही बंधु है!

Salok

“त्वमेव माता च पिता त्वमेव ,त्वमेव बंधु श्च सखा त्वमेव, त्वमेव विद्या द्रवीणंम त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ”

Bhav Arth

यानी guru ही है जो उन्हें आध्यात्मिक ऊंचाई के साथ – साथ आर्थिक and भौतिक ऊंचाई सभी प्राप्त करायेगी ।

साधको !

मैं आपको सुखदेव जी के बारे में बताऊंगा – उसमें क्या है ? कैसे उस बालक ने मूर्ति को पूछ कर सारे ज्ञान प्राप्त किया ।

प्यारे ! यहां सुखदेव का प्रसंग चला है कि सुखदेव ने कैसे अपने 86000 शीष्यों को ज्ञान दिया।

महज मात्र 12 साल का guru है, और शीष्य उनसे अधिक उम्र के हैं।

सवाल

शिष्य उनके होकर अपने प्रश्न करते हैं , सुखदेव से कि गुरु जी गुरु की पूजा या गुरु की स्थिति कैसे करें ?

गुरु को बाप, भाई ,बहन कैसे माने ?

क्या करें की गुरू तत्व को आत्म सात करें ?

क्या उन्हें स्नान करायें ?

क्या उसे दूध स्नान कराएं उनकी चरण पादुका का पूजा करें ?

या उसके हाथ पैर दबाए तो guru ka gyan mile?

Ans :-

सुखदेव जी ने कहा संसार का समस्त वैभव और संसार का समस्त ज्ञान गुरु दक्षिण पाद स्थत है।

मानें गुरु के दाहिने पैर में स्थित है, सारे समुद्र सारे सारे वैभव समाविष्ट है ,उनके दाहिने पैर में , दाहिने पैर का पूजन पर ,चिंतन मनन याने हम जो भी कार्य करें हम सारे कार्यों का कर्ता धर्ता गुरु को मान । पूरी तरह से हम गुरु पर समर्पित हो जाए ,तो हम यह कह सकते हैं कि छाया ने समर्पण की भावना ना इसे हम गुरु दीक्षा कह सकते हैं । गुरु के प्रति हम समर्पित हो जाते हैं ,तो हम मानेंगे कि हमने गुरु दीक्षा का सही अर्थ जाना ।

और पढ़ें

सुखदेव जी ने कहा केवल गुरु चरणों की सेवा की माध्यम से ही संभव है, कि आप ब्राह्म को , परमात्मा को पा सकेंगे और चरणों की सेवा ,और समर्पण के द्वारा प्राप्त कर सकेंगे ।

मुझे एक श्लोकी याद आ रहा है !

“गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः।”

sadhna Me Success Method and guru ka mahatv :-

सुखदेव जी ने जो कहा और यह श्लोक आदि शंकराचार्य ने भी इन्हीं बातों से अपने शिष्य को कहा ।

तो सारे संतो का एक ही मत बनता है यानी साधकों ज्ञान भी गुरु से ही प्राप्त हो सकेगा, दुकान पर बैठने या नौकरी करने से नहीं हो सकेगा ।उससे तो जीवको पार्जन ही होगा ।

इसलिए जीवन के सर्वोच्च पुण्य को अर्जित करने के लिए सुखदेव ने कहा कि गुरु चरणों की पूजा पूर्णता है । सब कुछ प्राप्त कर लेने की क्रिया है ।षोडशोपचार या किसी भी विधि से पूजन किया जा सकता है । जो भी आपका गुरु है उसे गुरु मानते हैं चाहे वह पत्थर ही क्यों हो न , एकलव्य ने पत्थर की मूर्ति को ही अपना गुरु द्रोणाचार्य मान लिया । और उसकी पूर्ण
विधि विधान के साथ पूजा करता रहा और अपने आप में विद्वान बन गया केवल पत्थर की मूर्ति की पूजा से अद्वितीय बन पाया । जब एकलव्य द्रोणाचार्य के पास गए द्रोणाचार्य ने कहा !

प्यारे ! आप ने भी कथा सुने होगें

मैं केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय को ही शिक्षा दूंगा और किसी को नहीं दूंगा ।

उनके यह कथन ज्ञान समम्त नहीं है ,जातिवाद से कलंकित है। मैं शिक्षा उन्हीं को देता हूं जो ब्राह्मण या क्षत्री है । या द्रोणाचार्य की न्यूनता थी ,एकलव्य ने सोचा ईसके जैसा उच्च कोटि का धनुर्धर नहीं है ,ऐसे शस्त्र विद्या और दूसरा कोई भी नहीं सिखा सकता है ।

तो उसने कहा मैं ब्राह्मण हूं ,आपके पास आया हूं ,और आपसे सीखना चाहता हूँ, उन्होंने उसे अपने शिष्यों के बीच में बैठा दिया ,पर एक दिन दोपहर का समय था भयंकर गर्मी थी और एकलव्य बैठा था तो उसकी जांघ पर द्रोणाचार्य सो गए, नींद आ गई ।

Ride Mor

कथा कहती है द्रोणाचार्य को नींद आ गई तो एकलव्य बिना हिले ढुले बैठा रहा , because थोडा भी हीलूंगा तो नींद टूट जाएगी ,और गुरु की नींद टूटने का मतलब मेरे सेवा में कमीं। उसी समय झाडी से एक सांप निकला और उसने एकलव्य को जंघे से काट लिया खून तेजी से बहने लगा मगर वह अपनी जंघा नहीं हिलने दिया ,क्योंकि हिलता तो आंख खुल जाति लेकिन गर्म- गर्म खून निकलता हुआ द्रोणाचार्य की पीठ पर लगा, उनकी आंख खुल गई !

आगे ➡

कथा कहती है साधकों द्रोणाचार्य उठ बैठे, देखा और कहा तुम कौन हो ? उसने कहा महाराज एकलव्य हूं , द्रोणाचार्य ने कहा तुम ब्राह्मण नहीं हो सकते , ब्राह्मण इतना सहनशील और इतना साहसी नहीं हो सकता ,तुम कौन हो ? उसने कहा महाराज मैं वीरपुत्र हूं, मगर और कोई रास्ता नहीं था , आपके पास आने के लिए चाहे झूठ ,छल हो पर मुझे धनुर्विद्या सिखना ही था।

उन्होंने छल का सहारा लिया और द्रोणाचार्य ने क्या कहा ? नहीं तुम निकल जाओ ,दो जाति के अलावा मैं किसी को शिष्य बनाता ही नहीं । निकल जाओ । उनके शरीर से खून बह रहा था ,जहर फैल रहा था ,और 1 लंबी कदमों से निकल गया । उसने मन ही मन कहा कि गुरुदेव मैंने आपको गुरु मान लिया तो आप से ही सीखुंगा ,यह आप निश्चिंत समझिए ।

आगे ➡

वह जंगल में आ गया गुड़गांव के पास “दिल्ली ” गुड़गांव जिसे पहले गुरु गांव कहते थे ,दिल्ली के कस्बा जिसे गुड़गांव कहते हैं !

गुड़गांव का अर्थ है गुरु गांव ,जंहा द्रोणाचार्य ,अर्जुन भीम को शिक्षा दी थी जिसे पहले गुरु गांव कहते थे अभी गुड़गांव कहते हैं ।

तो प्यारे :-

वहीं पर पास में जंगल में एकलव्य पहुंचा और वहां अभ्यास करने लगा की तीर जाए तो सूंत भर भी अंतर नहीं रहे , तीर लगे और तीर छोड़े तो वापस लौटे यह सब विद्या प्राप्त करने की क्रिया सीखना प्रारंभ कर दी ।

इधर सीखते सिखाते एक दिन द्रोणाचार्य को यह विश्वास हो गया कि अब अर्जुन जैसा कोई धनुर्धर नहीं है ।

उन्होंने कहा अर्जुन चलो आज तुम्हारा तीरसंधान देखना चाहता हूं ।

जंगल में पहुंचे वहां 1 किलोमीटर दूरी पर एक कुत्ता भौंक रहा था , दिखाई नहीं दे रहा था पर भोकने की आवाज आ रही थी, द्रोणाचार्य ने कहा अर्जुन तुम इस तरह तीर छोड़ो कि कुत्ता भोंकने के लिए मुंह खोले तो तीर से उसका मुंह भर जाए और वह भोकना बंद कर देगा ।

अर्जुन ने कहा जी गुरु की– आज्ञा मान अर्जुन ने तीर अनुसंधान किया लेकिन कुत्ता भोंकता ही रहा तिर पास से निकल गए ।

question

पास ही एकलव्य खड़ा था ,अचानक बाहर निकल कर आया और बोला गुरुदेव आप आज्ञा दे तो मैं कुछ करूं ?

ans

द्रोणाचार्य ने कहा तुम कौन हो ? क्या कर सकते हो ? ठीक है करो ,

उसने

तिर उठाएं 15 से अधिक तिर एक साथ धनुष पर से छोडें, सारे तीर्थ एक साथ छोड़े और वह कुत्ते के मुंह में पूरी तरह भर गए एकदम भोकना बंद हो गया, और रोता चीखता हुआ वह कुत्ता दूर भाग गया ।

द्रोणाचार्य अर्जुन और एकलव्य खड़े थे द्रोनाचार्य को आश्चर्य हुआ ,यह बालक इतना उच्च कोटि का धनुर्धर कैसे हैं ? कि 16 तिर संधान करके कुत्ते की मुह में भर दिया ।

सवाल

उन्होंने कहा तुमने यह कहां से सीखा ?

ans

उसने कहा महाराज आप से ही सीखा है , यह रही आप की मूर्ति मिट्टी की बनी हुई है, मैंने आपको गुरु मान लिया!

जब गुरु मान लिया इसी में प्राण है! इसी में ज्ञान है , ऐसा मानता हूं रोज चरणों में बैठता हूं ,रोज यह मुझे ज्ञान देते हैं ,रोज में सीखता हूं ,

द्रोणाचार्य ने कहा वास्तव में जीवन की श्रेष्ठतम साधना पद्धति गुरु सेवा है !

guru seva

एकलव्य को मालूम नहीं था क्या अर्चना होता है !

दूध क्या होता है !दही क्या होता है !पंचामृत क्या होता है !मंत्र क्या होते हैं ! Havan Kya hota ha? माला जप कैसे करनी होगी ? एक वीर बालक को क्या मालूम कभी पढ़ा लिखा तो था नहीं , but मगर केवल एक गुरु पूजन , guru Saradha द्वारा अपने क्षेत्र में अदिति बन गया उनका नाम हमें आज तक भी याद है !

द्रोणाचार्य ने छल कर के उसका अंगुठा ले लिया ।तीर चलाने के लिए तीर को अंगूठा और उंगली से पकड़ा जाता है । अंगूठा ही नहीं होगा तो पकड़ेगा कहां से ।

द्रोणाचार्य ने दक्षिणा के रूप में एकलब्य से अपना अंगूठा काटकर मांगा। और एकलब्य ने द्रोणाचार्य को अंगूठा दे दिया ।

जब द्रोणाचार्य ने अंगूठा मांगा कहा दक्षिणा के रूप में अपना अंगूठा काट कर दो ,उसने झट काट कर कहा यह लीजिए, आप इतनी सी बात के लिए सोंच रहे थे गुरुदेव ,आपको दो क्षण सोचना पड़ा जो बहूंत छोटी बात है ।

एकलब्य को ,शिष्यत्व बनने की विधि, मिट्टी की मूर्ति से विज्ञान चेतना प्राप्त करने की विधि ।या समर्पित हो कर ज्ञान पाने की विधि जानता था ।

एकलब्य पूरी तरह समर्पित था, समर्पण और उसकी गुरु दक्षिणा भी कैसी की कहा और एकदम से कर दिया , उसे मालूम था कि सब कुछ मेरा जो ज्ञान है ,जो वीरता है समाप्त हो जाएगी ,अंगूठा कटते ही मै तीर नहीं चला सकूंगा ।

16 तीर तो बहुत बड़ी बात है पकडुंगा कहां से ।मगर गुरु ने कहा और उसने झट से काट कर दे दिया ।

कहा यह लीजिए छोटी सी बात के लिए कितना सोच रहे हैं आप । यह सत्यता का हमारे सामने ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे गुरु सेवा की जाती है ? कैसे गुरु भक्ति की जाती है?

मित्र भाइयों तक के वीडियो

सुखदेव जी

सुखदेव जी ने कहा गुरु हो या गुरु की पादुका हो, या गुरु का स्मृति चिन्हों को ,आपके हृदय में गुरु किसी ना किसी रूप में स्थापित हो ,क्योंकि वही आपके परिवार को ऊंचाई पर उठा सकते हैं ,तुम स्वयं अपने आप को ऊंचा नहीं उठा सकते हो ,और यदि कर सकते तो अब तक कर क्या रहे थे ?,या सभी अपने आप में बहुत ज्ञानवान ,चेतना वान बन गए होते । इसलिए पहले सेवा गुरु की, षोडशोपचार विधि नहीं आता हो , चाहे कोई भी विधि आपको प्राप्त ना हो ।

बस आपको समर्पित होना है ,जो गुरु ने मंत्र दिया ,जो गुरु ने आपको ज्ञान बताया, योग, भक्ति, विधि बताया ।

और आप उसी पगडंडी पर चल सकते हो जिस पगडंडी पर गुरु ने चलने को बताया ,और आप सफलता हासिल कर सकते हैं ,यानी गुरु पर पूर्ण समर्पित होने से ही आप को ज्ञान प्राप्त हो सकता है ।

सुखदेव ने कहा कि साष्टांग प्रणाम के पीछे तर्क अर्थ और चिंतनीय है ,इसलिए अपने आप को पूर्ण दंडवत करते हुए उनके चरणों पर अपने अहंकार को रख देना।

Sukhdev ji ne bataya

यानी सुखदेव जी कहते हैं कि पूरी तरह से हम समर्पित हो जाए गुरु ने जो बताया उसे हम ब्रह्म वाक्य माने, यह उनकी विधि थी, क्योंकि सुखदेव जी स्वयं जन्म लेते ही जंगल में जाकर तपस्या करने लग गए थे , मगर बिना गुरु को देखे भी अपने आप में इतना ज्ञान का उदय हुआ इतनी उच्च कोटि के ग्रंथ लिखे ।

उन्होंने उसके अलावा तीन विधियों की भी जानकारी दिया :-

1. यानी समर्पण गुरु का

2. गुरु की सेवा

3. गुरु वाक्य को ब्रह्म वाक्य मानना यही विधि है !

जिसके द्वारा सारी साधनाएं सिद्ध हो सकती है तो

प्यारे!

हमने जाना कि एकलव्य ने कैसे अपने साधना में सफलता हासिल किया ।सुखदेव जी कैसे महान हो गए, कैसे उन्होंने तत्वों को साक्षात्कार किया ।

वास्तव में समर्पण की भावना से ही हम परमात्मा तत्व को गुरु तत्व को साक्षात्कार कर पाएंगे ।

किसी भी साधना में सफलता हासिल कर पाएंगे।

हम गुरु साधना से बड़ी साधना गुरु समर्पन से आसाना से हम परमात्मा पा सके ,ज्ञान पा सके और कोई दुसरा विधि हो ही नहीं सकता ।

सुख देव जी कहते हैं ,अपने 79000 शिष्यों को जिनमें उनके चाचा ,काका, मामा और कोई 200 साल 300 साल के ऋषि बैठे थे, उन्हें वह उपदेश कहते हैं ।

जबकि वह स्वयं 12 साल की है। कि मैं आपको आशीर्वाद देता हूं कि आप वास्तव में ऋषि बने ।

और मैं भी आपको यही कहूंगा कि मेरी आपको अग्रिम बधाई है कि किसी भी साधना में आप सफलता हासिल करें ,और आप साधना की ऊंचाइयों को जाने ,और अपने गुरू पर आपकी निष्ठा हो जाए ।आपका गुरु मूर्ति हो चाहे ,आपका गुरु साक्षात हो ,चाहे आप जिस भी गुरू को मानते हो ।आप के गुरू की बताएं मंत्र का जाप करें, श्रद्धा पूर्वक करें ,गुरु के बताए सेवा कार्य को करें ।

focus word:-

और समर्पण रखे बस आपको दो ही काम करनी है ।

1. श्रद्धा और

2.विश्वास

आपको तीन बातों को ध्यान देना है :-

1. किसी भी साधना में गुरु के बताए मंत्र का जाप

2. गुरु पर पूर्ण समर्पण

3.गुरु की सेवा जिससे आप कोई भी साधना हो आप सफल हो सकते हैं ।

sadhna Me Success Method and guru ka mahatv लेख आपने पढा समझा अब आप guru sadhana Sadhna Kare आपको अपनी साधना के लिए अग्रिम बधाई हो। मै परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ आप जीवन में success hoye ! प्यारे – और sadhna Me Success Method and guru ka mahatv अच्छा लगा हो तो आप साधक भाइयों तक शेयर जरूर कीजिएगा सेवा कर पुन्य लाभ जरूर कमायें अगली लेख में फिर मिलेंगे ।

Thankyou

क्रिया योग ,ध्यान योग ,मंत्र साधना शिविर में शामिल होना चाहते है तो संपर्क करे वाट्स अप नं 7898733596 साधना विषय :- 1.क्रीया योग की उस गुप्त साधना का अभ्यास जिनका, वीडियो या लेख में बताना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। २. ध्यान की खाश तकनीक। ३. मंत्र योग की खाश विधि। ४. समाधी की गुप्त रहस्य। ५. कुंडलिनी जागरण की गुप्त और विशेष टेक्निक। 6. आर्थिक और आध्यात्मिक विकास के लिये विशेष साधना विधि नोट :- Lockdown के बाद साधना शिविर में शामिल होकर आध्यात्मिक विकास करें । यदि आप का भाग्य में गुरु क्रपा नहीं है तो आप अभागा हैं। और गुरु दीक्षा लेकर ईस दिन गुरू मंत्र का विशेष अनुष्ठान कीया तो अभागा भी महा पुण्य वान, माहा भाग्यशाली बन जायेगा सिर्फ श्रद्धा विश्वास रखता हो !